वसन्त पंचमी

माँ शारदे का प्राकट्य दिवस एवं श्रष्ठि के निर्माण में माँ वागेश्वरी का अनुपम योगदान है।
ब्रह्मा की संसार रचना में माँ सरस्वती ने अपनी सम्पूर्ण कलाएं एवम् अपने स्वर संसार को प्रदान कर
संसार को वाणी प्रदान की।
हिंदी संवत्सर में वसन्त का आगमन नवीनता के आगमन का संदेसा लाता है ।

सूर्य के उत्तराण् होते ही वसंतपंचमी प्रकृति में एक नवीन स्वरसा भर देती है।
संसार में नविन ता फूलो का खिलाना ,और यह दिवस प्राचीन समय से ही वंतोत्सव के रूप में मनाया
जाता रहा हा। जिसका उल्लेख हमारे संस्कृत साहित्य में मिलता है ।
कालिदास भास अदि के नाटको में भी इसका वर्णन आता है ।

आज हम अपनी सनातनी संस्कृति से टूट कर वेलेंटाइन डे मानते है जो हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है ।

वसंत उत्सव ही हमारी संस्कृति में प्रेम को प्रकट करने का दिन माना जाता है ।

और सबसे बड़ी बात हमारा धर्म इस दिन को अबूझ महूरत मानता है ।
इसदिन कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ करना शुभ माना जाता है।

"मुझे नाज़ है,अपनी संस्कृति,धर्म और अपने देश पर "

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